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Thursday, February 9, 2012

लकीरें!


लकीरें!

मेरे पिता संस्कृत व्याकरण के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैंl एकबार मै गाँव गया, उन्होंने बहुत उत्सुकता से पूछा, बेटा तुम काम क्या करते हो? मैंने कहा - बाबूजी! लकीरें खींचता हूँ , उन्होंने फिर पूछा कैसी लकीरें
[[ मैं समझ नहीं पा रहा था कहाँ से शुरू करूँ  इन लकीरों के बारे में ! कुछ  सीधी लकीरें, कुछ टेढ़ी लकीरें, कुछ गोल लकीरें, या  लकीरों के ऊपर लकीरें
ये लकीरें भी बहुत पेचीदा चीज है, जब सीधा खीचना होता है तो लोग कहते हैं ये तो बहुत आसान है, जल्दी हो जाएगा, सीधी  लकीरों को नापना भी बहुत आसान होता है और खीचना भी! पर सीधी लकीरों से काम  कहाँ चलता है? और आज के समय में कौन चाहता है सीधी लकीरें और सीधा रास्ता?  न कोई रास्ता सीधा है , न कोई नदियाँ! पानी तो हर वक़्त टेढ़ी ही बहती है, फिर सीधे लकीर से कैसे काम चलेगा?
 एक जमाना था जब लोग घर सीधा बनबाते थे, चारो तरफ से घर, घर से लगा हुआ बरामदा  और बीच में आँगन, जिसे लोग बहुत अच्छा मानते थे, पर आज तो आंगन शब्द का जगह बालकोनी ने ले लिया ! और घर भी लोग कुछ अलग चाहते हैं तो फिर सीधी लकीरें  कहाँ खीचूँगा?

कभी भी सीधी लकीरों को लोग देखकर ही छोर देते हैं, सोचते हैं ये तो सामान्य है, यही लकीर अगर टेढ़ी  हो तो लोग उत्सुकता से एकबार जरुर देखते हैं की इसमें कुछ खास होगा, भले ये लकीरें विवशता से खिची गयी हो या फिर आकर्षण का केंद्र बनाने के मकशद से ! इसके तह तक कौन जाना चाहता है? ]]
मैं इसी उधेरबुन में था,उन्होंने फिर पूछा- कैसी लकीरें
जब मेरी तन्द्रा टूटी तो चौंक कर बोला - हाइवे या  रेलवे कैसे बनना है, इसमें पुल कैसा होगा ये लकीरों के द्वारा दर्शाता हूँ!
उन्होंने कहा - बेटा, ध्यान रखना,  यदि लकीरें ही हमारे रास्ते  का भविष्य है, इसे ज्यादा  मत उलझाना !
यदि लोगों को उलझाओगे तो  तुम भी आसानी से नहीं गुजर सकते!  :- राघब

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