सिर्फ मैं ही अमर हूँ!
मानव:-
अस्तित्व है मानव हूँ,
स्वाभिमान है, अमर हूँ!
ज्ञान है बुद्धिजीवी हूँ,
कब तक छुपे रहेंगे किसी की आड़ में, प्रकाश से डरकर?
क्यूँ भागूं रात में, बड़े सायों को देखकर?
छाया:-
नहीं, मैं कभी भागता कहाँ,
प्रकाश से डरता कहाँ?
दिन में? हर किसी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता हूँ, पीछे नहीं!
रात में? दृष्टिविहीन तुम हो जाते हो, मुझे देखते नहीं!
मैं प्रकृति हूँ, साया हूँ,
अस्तित्व भी है, स्वाभिमान भी!
ज्ञान भी है, अमरता भी!
बाकपटुता नहीं है, बुद्धिजीवी नहीं हूँ?
लेकिन सिर्फ मैं ही अमर हूँ!
सिर्फ मैं ही अमर हूँ!!
अस्तित्व विहीन तुम हो, अस्तित्व मानवता का!
तुम्हारा अंत निश्चित है, अमरता स्वाभिमान का!
तुम बुद्धिजीवी नहीं, ये तो बाकपटुता है!
ज्ञान तुम्हें कहाँ? ये तो प्रकृति है!
अपने को पहचानो,मेरा क्या है?
मैं? मैं तो साया हूँ!!
मेरा अस्तित्व है, मैं अंतहीन हूँ!
स्वाभिमान मेरा है, मैं ज्ञानी हूँ!
देख, मैं ही छाया हूँ,
मैं बोलता नहीं, यही मेरे अमरता का कारण है!
और मैं ही अमर हूँ,
सिर्फ मैं ही अमर हूँ!!
--- राघब

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